राज्य सिल्क फेडरेशन

मध्यप्रदेश शासन

योजनाएं

1. प्रशिक्षण एवं अनुसंधान

इस योजना का मुखय उद्देश्य रेशम अधिकारियों/कर्मचारियों को विभिन्न प्रकार के तकनीकी एवं लेखा प्रशिक्षण देना व कृषकों / हितग्राहियों को रेशम गतिविधियों का प्रशिक्षण /एक्सपोजर भ्रमण कराना है। इस योजना के अन्य प्रभार मद के अंतर्गत मार्केटिंग सर्वे, मलबरी बीज, ककून के उत्पादन कार्य एवं मलबरी बीज केन्द्रों का संधारण कार्य संपन्न कराया जाता है।

ग्रामोद्योग विभाग के अंतर्गत रेशम संचालनालय के अधीन 2 मिनी आई.टी.आई. क्रमशः वारासिवनी (जिला बालाघाट) एवं सारंगपुर (जिला राजगढ) में संचालित है, जिनमें कृमिपालन, धागाकरण एवं वस्त्र बुनाई ट्रेड के अंतर्गत प्रशिक्षण दिया गया है।

2. मलबरी स्वावलंबन योजना

रेशम संचालनालय द्वारा पूर्व में नाभिकीय रेशम केन्द्रों के रूप में चलाये जा रहे रेशम केन्द्रों का भोगाधिकार हितग्राहियों को दिया गया है, ताकि उनमें स्वरोजगार की भावना जागृत हो। हितग्राहियों को केन्द्र पर उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी गई है।

3. मलबरी रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम

मलबरी कोया उत्पादन :- प्रदेश के बुनकरों द्वारा बड़ी मात्रा में आयातित रेशम के उपयोग को दृष्टिगत रखते हुए उच्च गुणवत्तायुक्त बाजारोन्मुखी कोया / रेशम धागे के उत्पादन पर जोर दिया गया है।

रेशम केन्द्रों में निर्माण कार्य, सिंचाई सुविधाएं कार्य कराये जाते हैं, साथ ही मलबरी पौधरोपण एवं मलबरी बीज ककून उत्पादन का कार्य कराया जाता है।

4. टसर रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम

टसर कोया उत्पादन

पालित :- इस योजना का मुखय उद्देश्य कोसा वस्त्र उत्पादन हेतु प्रदेश के बुनकरों को कच्चा माल उपलब्ध कराना है, इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्थापित बीज केन्द्रों / पायलेट प्रोजेक्ट केन्द्रों / ग्रेनेजों द्वारा उत्पादित टसर रेशम कृमि के स्वस्थ डिम्ब समूह (निरोग अण्डे) प्रदाय किये जाते हैं, जिसके लिये बेसिक सीड केन्द्रीय रेशम बोर्ड के केन्द्रों से प्राप्त किया जाता है तथा कृमिपालन कर प्रगुणित किया जाता है। कृमिपालन, कृमिपालकों द्वारा खुले आकाश के नीचे वन क्षेत्रों मे उपलब्ध साजा/अर्जुन के पौधों पर होता है।

नैसर्गिक :- प्रदेश के मण्डला, शहडोल एवं सिवनी जिलों के साल/अर्जुन वनों से नैसर्गिक रूप में टसर कोसा का उत्पादन होता है जहॉं ककून के उत्पादन स्तर को लगातार बनाये रखने के लिए विभाग द्वारा प्रगुणन कैम्प लगाये जाते हैं। वनों में उत्पादित ककून को स्थानीय हितग्राही एकत्रित कर स्थानीय हाट-बाजार में विक्रय कर आय अर्जित करते हैं।

5. उत्प्रेरण विकास कार्यक्रम

मलबरी :-

मलबरी रेशम को निजी क्षेत्र में बढ़ावा देने हेतु कृषकों की निजी भूमि में शहतूती पौधरोपण के लिये विस्तार कार्यक्रम लिया गया है। इसकें अंतर्गत छोटे एवं मध्यम किसानों की निजी भूमि पर 0.5 एकड़ से 5.00 एकड तक भूमि पर मलबरी पौधरोपण कराया जाता है। उक्त पौधरोपण करने वाले कृषको को केन्द्रीय रेशम बोर्ड के उत्प्रेरण विकास कार्यक्रम के तहत सहायता प्रदान की जाती है जिसमें कृमिपालकों को प्रशिक्षण, प्रारंभिक कृमिपालन उपकरण, कृमिपालन भवन एवं ड्रिप ऐरीगेशन सिस्टम आदि उपलब्ध कराये जाते हैं ।

टसर :-

टसर क्षेत्र में कृमिपालन हितग्राही को खाद्य पौधरोपण तथा चाकी उद्यान के उचित रख-रखाव तथा कृमिपालन उपकरण हेतु सहायता अनुदान प्रदान की जाती है।

इरी :-

इरी रेशम विकास एवं विस्तार हेतु अरण्डी पौधरोपण, प्रशिक्षण, टूलकिट हेतु सहायता तथा इरी कृमिपालन हेतु भवन निर्माण के लिए सहायता अनुदान प्रदान किया जाता है।

6. इरी रेशम विकास एवं विस्तार कार्यक्रम

प्रदेश में अरण्डी के पौधे पर आधारित इरी रेशम के माध्यम से रोजगार सृजन का कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। इरी रेशम के कीड़े को अरण्डी के पत्ते पर पाला जाकर रेशम उत्पादन कराया जाता है। अरण्डी का पौधा कम उपजाऊ भूमि पर लगाया जा सकता है तथा इसे सिंचाई की कम आवश्यकता होती है। अरण्डी के पौधे पर रेशम कीट पालन के साथ-साथ कृषक को अरण्डी के बीज तथा अरण्डी के पौधे की जड़ के विक्रय से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है क्योंकि अरण्डी के बीज से तेल उत्पादन तथा जड़ औषधि उत्पादन में काम आती है।

7. स्पेशल प्रोजेक्ट

मलबरी टसर एवं इरी ककून तथा रेशम उत्पादकों के शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक आर्थिक उत्थान हेतु विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिये राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय संस्थाओं से सहायता प्राप्ति हेतु विशिष्ट परियोजनाएं तैयार करने एवं उनके क्रियान्वयन में हिस्सेदारी के लिये सहायता ।

8. एकीकृत क्लस्टर विकास कार्यक्रम

प्रदेश के ऐसे जिलों में जहां कि रेशम उत्पादन हेतु सामाजिक/र्आर्थिक एवं प्राकृतिक परिस्थितियां पूर्णतः अनुकूल है किंतु प्रति व्यक्ति भू-जोत का आकार न्यूनतम होने के कारण छोटे एवं सीमांत कृषकों, परंपरागत कृषि से कम आय प्राप्त कर रहे ऐसे संकुलों में रेशम की ''मिट्टी से रेशम'' तक की गतिविधियों हेतु विभिन्न चरणों में सहायता प्रदान करते हुए संपूर्ण क्लस्टर का समग्र विकास किया जाना ।

9. उद्यमियों/स्वसहायता समूहों/अशासकीय संस्थाओं को सहयोग

रेशम उद्योग से संबद्ध व्यक्तियों, उद्यमियों/स्वसहायता समूहों, अशासकीय संस्थाओं को विकास, उत्पादन एवं विपणन से संबंधित गतिविधियों में सहयोग ।

10. प्रमोशन एवं अभिलेखीकरण

रेशम उद्योग प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में कम पूंजी पर रोजगार उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस उद्योग में लगे हितग्राहियों को नियमित रोजगार मिले इस हेतु उनके उत्पादों की मांग बढ़े तथा उन्हें लोकप्रिय बनाने के लिये प्रमोशन एवं अभिलेखीकरण की नितांत आवश्यकता है। अभिलेखीकरण इसलिये भी आवश्यक है कि यह न केवल विकास कार्यों को दर्शाता है बल्कि इस उद्योग के इतिहास को भी दर्शाता है। अभिलेखीकरण का उपयोग डायग्नोस्टिक स्टेडी एवं भावी योजनाएं तैयार करने में सहायक होगा।